धाद परिचय

लोकभाषा अपने आप में पूर्ण और मौलिक होती है। हर भाषा की रचना सैकड़ों वर्षों की अवधि में निरंतर प्रयोग करते हुए होती है। भाषायें अपने- अपने समाजों की अभिव्यक्तियों को माध्यम और शब्द देतीआरही हैं। भाषायें संस्कृतियों को जन्म देती हैं । भाषायें सभ्यताओं के चिन्ह तो हैं ही, दुनिया की सांस्कृतिक विविधता की प्रमाण भी हैं। हर भाषा की अपनी मौलिकता ,शब्द संपदा और भाव सौन्दर्य होता है। उसकी अपनी परम्परा और इतिहास होता है भूगोल होता है।

भाषा की महत्ता को देखते हुए भाषा को बचाना हमारा सांस्कृतिक दायित्व है। भाषा बचेगी तो उसकी संस्कृति बचेगी, उस भाषा का लोकज्ञान बचेगा और भाषा निरंतर बोलकर,लिखकरऔर पढ़कर अर्थात सतत प्रयोग से ही बच सकती है।

लोकभाषा गढ़वाली के संरक्षण , संवर्द्धन उसके व्यापक प्रचार -प्रसार ,भाषा के दस्तावेजीकरण और गढ़वाली में साहित्य सृजन करने वाले साहित्यकारों,मनीषियों को मंच उपलब्ध कराने के लिए गढ़वाली मासिक 'धाद ' का प्रकाशन किया जा रहा है । लोकभाषा गढ़वाली की शब्द संम्पदा अपने प्रभावपूर्ण ढंग से अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी ताकत के साथ स्थापित हो, इस भाषा को जानने समझने वाले लोगों, शोधकर्त्ताओं के लिए 'धाद' अपनी प्रतिबद्धता के साथ सबके लिए सहज उपलब्ध है।

हमारे समाज की सांस्कृतिक पहचान हमारी भाषा से होती है । भाषा हमारे संस्कार को व्याख्या करती है और लोक केसरोकारों को शब्द देती है। गढ़वाली भाषा अपनी शब्द संपदा से , लालित्य से,भाषा की अपनी रवानगी से कालजयी हो । लोकभाषा गढ़वाली की इस जात्रा में'धाद' पत्रिका एक पायदान केरूप में आप सब भाषाके अनुरागीयों , लेखकों , पाठकों , शुभचिंतकों की मंगलकामनाओं और सद्भावनाओं के साथ उपलब्ध रहेगी।


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